Sunday, 17 April 2011

यौन और मानसिक शोषण में पिसता बचपन


मानव जगत मे उत्साह उमंगो एवं सपनो का सर्वोक्रष्ट जीवीत पुंज बच्चो को माना गया है बालक किसी भी राष्ट्र के भविष्य का प्रतिनिधित्व करते है वे देश के भावी कर्ड धारएवं प्रगति का आइना  है बच्चे  का चमकता या मोर्जहाया  हुआ चेहरा इस बात का प्रतिक है की वह देश कितना खुशहाल संपन  और विपन्न है बच्चे सभ्यता एवं भविष्य के आधार पर मानवता  के उज्वाल भविष्य के आधार है और निरंतर  पुनर  जीवन का स्त्रोत  भी इन्ही के आधार पर मानवता के उज्वल भविष्य की नीव रखी जा सकती है किन्तु चिंता का विषय ये है की इन बच्चो की बड़ी संखिया  ऐसे बच्चो    की है जिनका जीवन यौन  शोषण  और मानसिक  शोषण मे पिस्ता जा रहा है  बच्चो के  बचपन की नीव ही अगर डगमगाई हुई   हो तो आगे का  भविष्य    उनका क्या होगा ये सब जानते और समझते है
हमारे समाज का ताना बाना वयस्कोंखासकर मर्दों की सुखसुविधाओंजरुरतोंरुचियों और अधिकारों को ध्यान में रखकर बना है। इसी के इर्द गिर्द घूमती हैहमारी राजनीतिकानूनपढ़ाईचिकित्सा और यहां तक कि आमदनी और स्रोतों के बंटवारे भी। स्वाभाविक तौर पर  तो हम बच्चों के अधिकारों के बारे में जानना चाहते हैं और  ही उनकी सुरक्षा और सम्मान के बारे में पर्याप्त उपक्रम करते हैं। हां उन्हें नासमझकमजोरलाचार आदि मानकर करुणा या दया का भाव जरुर रखते हैं। आवागमन के साधनोंवाहनोंसार्वजनिक शौचालयोंरेस्टोरेन्टोंसभागृहोंसड़कोंरेलवे स्टेशनोंबस अड्डों और यहां तक कि स्कूलों  अस्पतालोंका निर्माण बच्चों की सुविधा और सुरक्षाओं को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता क्योंकि हम बच्चों का अपना कोई वजूद नहीं समझते।
 बच्चों के यौन उत्पीड़न के बारे में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट हमारे आर्थिक विकास तथा सभ्यता  संस्कृति की डींगों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। नारी रक्षा की महान परंपराओं की दुहाई देने वाले भारत में हर 155वें मिनट में किसी  किसी नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म होता है। सरकारी रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दुनिया में सबसे ज्यादा यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे हमारे देश में ही बसते हैं।
बचपन के प्रति उदासीनता भरी सामाजिक मानसिकतागैर जिम्मेदाराना रवैया तथा चारों ओर पसरी संवेदनशून्यता इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बडे़ कारण हैं। इसलिए यह लाजमी है कि बच्चों के प्रति व्याप्त किसी भी प्रकार की हिंसाअसुरक्षा  उनकी जिन्दगी के जोखिमों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये साथ ही सर्वांगीण समाधान भी ढूंढा जाय। रोज  रोज घटने वाले ऐसे शर्मनाक हादसों की कोई कमी नहीं है। ऐसे कए हादसे हमारे देश की राजधानी  दिल्ली मे होते रहते है सोचने वाली बात यह है की जब दिल्ली का यह  हाल है तो देश के दूर दराज इलाकों में  तो हमारे बच्चे  कितनी  असुरक्षापूर्ण जिन्दगी जी रहे हैंइसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
 
हर रोज कहीं  कहीं से स्कूलपड़ोसअस्पतालोंमनोरंजन केन्द्रोंधर्मस्थलोंपुलिस अथवा दूसरे सरकारी महकमों द्वाराअपने कोमल शरीरपवित्र आत्मा और निष्कलंक सम्मान को मिट्टी में मिलाकरखून का घूंट पीकर या सिसकते सुबकते अनगिनत बच्चे घर लौटते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनको यह भी नसीब नहीं है कि वे जीवित लौट सकें। फैक्ट्रियोंखदानोंईंट के भट्ठों में कोमल अंग गलाते-गलाते कभी नि:शब्दकभी करुण क्रंदन करते वहीं अपना दम तोड़ने के लिए अभिशप्त हैं। बहुत से कुपोषणभूख और बीमारी की वजह से मौत के मुंह में पहुंच जाते हैं। कईयों को सड़कों पर ही ट्रकबसेंकारें कुचल डालती हैंतो दूसरे कई खटारा बसों या नशाखोर अथवा नौसिखिए ड्राइवरों की कृपा से दुर्घटनाओं में चल बसते हैं। स्पष्ट तौर पर हमारे समाज में बच्चों की हिफाजत करने के बोधतैयारी और ईमानदार कोशिशों का घोर अभाव है।

कथित किशोर सुधारगृहों की भी पूरी दुर्गति है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे गृहों के शत प्रतिशत बच्चे उसे बच्चों की जेल ही मानते है। वहां भी आधे बच्चे वयस्कों द्वारा होने वाली किसी  किसी प्रकार की हिंसा के शिकार होकर दीवारें तक फांदकर भागने के लिए विवश हैं। वहां के 80 प्रतिशत कर्मचारियों और अधिकारियों को बाल अधिकारों की कभी कोई जानकारी ही नही दी गई। नतीजा साफ है कि दूर दराज की बात छोड़िये देश की राजधानी दिल्ली में ही पिछले 10 महीनों में सरकार द्वारा चलाये जा रहे इन कथित सुधारगृहों में कम से कम 12 बच्चों की मौत हो गई। दुर्भाग्य से न्यायालयों तक की भी यही स्थिति है।

हमारा समाज और सरकार जब तक बच्चों की कही-अनकही जरुरतोंउनके हकों तथा  उनकी शारीरिक या  मानसिक उम्र का ख्याल रखते हुए उनको विशेष सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराताबच्चों से संबंधित कानूनोंन्यायालयों के निर्देशोंयोजनाओं आदि के क्रियान्वयन के लिए नियुक्त किये गये व्यक्तियों को कानूनी तौर पर जवाबदेह नहीं ठहराताजब तक हम बच्चों से दोस्ताना व्यवहार की एक संस्कृति विकसित नहीं कर लेते और जब तक हम उनकी हिफाजत के लिए एक व्यापक सामाजिक  मानसिक सुरक्षा कवच निर्मित नही करतेतब तक इस तरह के बचपन विरोधी गम्भीर अपराधों को महज हादसा या रोजमर्रा की घटनायें ही माना जाता रहेगाकभी न्याय अथवा राहत में देरी तो कभी चन्द लोगों की दरिन्दगी के बहाने बनाकर आखिर कब तकहम हमारे बच्चों को मरनेजलनेअपाहिज होने और बलात्कार  हिंसा का शिकार होने के लिए अभिशप्त रखेंगे?
बचपन के प्रति उदासीनता भरी सामाजिक मानसिकतागैर जिम्मेदाराना रवैया तथा चारों ओर पसरी संवेदनशून्यता इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बडे़ कारण हैं। इसलिए यह लाजमी है कि बच्चों के प्रति व्याप्त किसी भी प्रकार की हिंसाअसुरक्षा  उनकी जिन्दगी के जोखिमों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये साथ ही सर्वांगीण समाधान भी ढूंढा जाय।मनोविद कहते हैं कि इस तरह बच्चों का दबाव में रहना उन्हें भावनात्मक रूप से कमजोर कर देता हैइतना दबाव तो शायद कोअब इस तरह के कानून बनाने की बात हो रही है कि बच्चों को खेत में काम करने से रोका जाएघर में काम करने से रोका जाएहोटल और अन्य श्रमशोषण स्थानों के बारे में कानून बने और बच्चों का बचपन वापस लौटे/मनुष्य के जीवन मे बालावस्था एक ऐसी स्थ्ती है जिसमे उसको सबसे अधिक सहयता देख भाल ,प्रेम सहानभूति  और सुरक्षा  की आवश्यकता होती है जिन बच्चो का बाल जीवन सुखी संतुस्ट और सुरक्षित  गुजरता है उनका व्यक्तित्व और भविष्य भी सुख  मे बीतता है

दीपिका  शर्मा (gahaziabad ) 


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